
जिणवयणमोसहमिणं विषयसुहविरेयणं अमिदभूदं ।
जरामरणवाहिवेयण खयकरणं सव्वदुक्खाणं ॥843॥
जिणवयणणिच्छिदमदीअ-विरमणं अब्भुवेंतिसप्पुरिसा ।
ण य इच्छंति अकिरियं जिणवयणवदिक्कमं कादुं ॥844॥
अन्वयार्थ : यह जिन वचन ही एक औषधि हैं तो इन्द्रियों द्वारा प्राप्त सुखों का त्याग कराने वाली हैं, सर्वांग में सन्तर्पण का कारण होने से अमृत रूप है, ज्वर आदि सर्व रोगों को तथा उनसे उत्पन्न हुए दु:खों को नष्ट करने वाली है । जिन वचन में दृढ़ निश्चित बुद्धि रखने वाले वे साधु विरतिभाव को धारण करते हैं किन्तु जिन-वचनों को उल्लंघन करके वे विरूद्ध क्रिया करना नहीं चाहते हैं । भले ही प्राण चले जावें किन्तु आगम विरूद्ध क्रिया नहीं करते हैं ।