
विकहा विसोत्तियाणं खणमवि हिदएण ते ण चिंतंति ।
धम्मे लद्धमदीया विकहा तिविहेण वज्जंति ॥859॥
कुक्कुय कंदप्पाइय हासं उल्लावणं च खेडंच ।
मददप्पहत्थवणिं ण करेंति मुणी ण कारेंति ॥860॥
अन्वयार्थ : वे मुनि मन से क्षण मात्र भी विकथा और कुशास्त्रों का चिन्तवन नहीं करते हैं । धर्म में बुद्धि लगाने वाले वे मुनि मन-वचन-काय से विकथाओं का त्याग कर देते हैं । काय की कुचेष्टा, कामोत्पादक वचन, हँसी, वचनचातुर्य, परवंचना के वचन, मद व दर्प से कर ताड़न करना आदि चेष्टाएँ मुनि न करते हैं । न कराते हैं ।