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विकथा क्यों नहीं?
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ते होंति णिव्वियारा थिमिदमदी पदिट्ठिदा जहा उदधी ।
णियमेसु दढववदिणो पारत्तविमग्गया समणा ॥861॥
अन्वयार्थ :
वे निर्विकार अनुद्धत मनवाले, समुद्र के समान गंभीर, नियम अनुष्ठानों में दृढ़व्रती तथा परलोक के अन्वेषण में कुशल श्रमण होते हैं ।