
णिच्चं च अप्पमत्ता संजमसमिदीसु झाणजोगेसु ।
तवचरणकरणजुत्ता हवंति सवणा समिदवापा ॥864॥
अन्वयार्थ : वे श्रमण संयम तथा समिति में ध्यान तथा योगों में नित्य ही प्रमाद रहित होते हैं एवं तप चारित्र तथा क्रियाओं में लगे रहते हैं अत: पापों का शमन करने वाले होते हैं ।