
हेमंते धिदिमंता सहंति ते हिमरयं परमघोरं ।
अंगेसु णिवडमाणं णलिणीवणविणासयं सीयं ॥865॥
अन्वयार्थ : शीतकाल में परमघोर तुषार के गिरने से सम्पूर्ण वनस्पतियाँ जल जाती है, प्रचण्ड हवा-शीत लहर के चलने से सभी प्राणी समूह काँप उठते हैं, ऐसे समय में परम धैर्य रूप आवरण से अपने शरीर को ढ़कने वाले वे मुनिराज गिरते हुए हिमकणों को, तुषार को सहन कर लेते हैं ।