
जल्लेण मइलिदंगा गिह्ये उण्णादवेण दड्ढंगा ।
चेट्ठंति णिसिट्ठंगा सूरस्स य अहिमुहा सूरा॥866॥
अन्वयार्थ : पसीने से युक्त धूलि से मलिन अंग वाले, ग्रीष्म ऋतु में उष्ण घाम से शुष्क शरीरधारी, कायोत्सर्ग से स्थित शूर मुनि सुर्य की तरफ मुख करके खड़े हो जाते हैं ।