
धारंधयारगुविलं सहंति ते वादवाद्दलं चंडं ।
रत्तिंदियं गलंतं सप्पुरिसा रुक्खमूलेसु ॥867॥
अन्वयार्थ : वर्षाकाल में सभी मार्ग जल से पूरित हो जाते हैं, गरजते हुए मेघ और घोर वङ्का के शब्दों से दिशाओं के अन्तराल बहिरे हो जाते हैं । उस समय अनेक सर्पों से व्याप्त ऐसे वृक्ष के नीचे वे मुनि खड़े हो जाते हैं । वहाँ पर वायु के झकोरे से सहित सतत् बरसते हुए मेघों की जलधारा को वे मुनि सहन करते हैं ।