+ परीषह सहन -
वादं सीदं उण्हं तण्हं च छुधं च दंसमसयं च ।
सव्वं सहंति धीरा कम्माण खयं करेमाणा ॥868॥
दुज्जणवयण चडयणं सहंति अच्छोड सत्थपहरं च ।
ण य कुप्पंति महरिसी खमणगुणवियाणया साहू ॥869॥
जइ पंचिंदयदमओ होज्ज जणो रूसिदव्वय णियत्तो ।
तो कदरेण कयंतो रूसिज्ज जए मणूयाणं ॥870॥
जदि वि य करेंति पावं एदे जिणवयण बाहिरा पुरिसा ।
तं सव्वं सहिदव्वं कम्माणं खयं करंतेण ॥871॥
अन्वयार्थ : कर्मों का क्षय करते हुए वे धीर मुनि वात, शीत, उष्ण, प्यास, भूख, दंशमशक आदि सभी परीषहों को सहते हैं । दुर्जन के अत्यन्त तीक्ष्ण वचन, निन्दा के वचन और शस्त्र के प्रहार को सहन करते हैं किन्तु वे क्षमा गुण के ज्ञानी मर्हिष मुनि क्रोध नहीं करते हैं । यदि मनुष्य पंचेन्द्रिय को दमन करने वाला होवें तो वह क्रोध आदि से छूट जायेगा । पुन: इस जगत में मनुष्यों पर किस कारण से यमराज रूष्ट होगा ? अर्थात् रूष्ट नहीं होगा । जिनमत से बहिर्भूत कोई मनुष्य यद्यपि पाप करते हैं तो भी कर्मों का क्षय करते हुए मुनि को वह सब सहन करना चाहिए ।