+ कषाय विजय -
लद्धूण इमं सुदणिहिं ववसायविरज्जियं तह करेह ।
जह सुग्गइचोराणं ण उवेह वसं कसायाणं ॥872॥
अन्वयार्थ : इस श्रुत-रूपी निधि को सम्यक् प्रकार से प्राप्त करके-ऐसा व्यवसाय विशेष करो कि जिससे तुम सुगति के चुरानेवाले इन कषायों के वश में नहीं हो जाओ ।