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तप:शुद्धि के स्वामी
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पंचमहव्वयधारी पंचसु समिदीसु संजदा धीरा ।
पंचिंदियत्थविरदा पंचमगइमग्गया सवणा ॥873॥
अन्वयार्थ :
पंच महाव्रत धारी, पाँच समितियों से संयत, धीर, पंचेन्द्रियों के विषयों से विरक्त, सिद्ध गति को ढूँढते हुए वे श्रमण तप: शुद्धि के करने वाले होते हैं ।