+ उसी को स्पष्ट करते हैं -
ते इंदिएसु पचसु ण कयाइ रागं पुणो वि बंधंति ।
उण्हेण व हारिद्दं णस्सद्दं राओ सुविहिदाणं ॥874॥
अन्वयार्थ : वे मुनि पाँचों इन्द्रियों में कदाचित् भी पुन: राग नहीं करते हैं, क्योंकि सम्यक् अनुष्ठान करने वालों का राग ताप से हल्दी के रंग के समान नष्ट हो जाता है ।