+ इन्द्रियजय -
विसएसु पधावंता चवला चंडा तिदंडगुत्तेहिं ।
इंदियचोरा घोरा वसम्मि ठविदा ववसिदेहिं ॥875॥
अन्वयार्थ : विषयों में दौड़ते हुए चंचल, उग्र और भयंकर इन इन्द्रिय रूपी चोरों को चारित्र के उद्यमी मुनियों ने मन-वचन-काय के निग्रह से इन्हें अपने वश में कर लिया है ।