+ मन के निग्रह का दृष्टान्त -
जह चंडो वणहत्थी उद्दामो णयररायमग्गम्मि ।
तिक्खंकुसेण धरिदो णरेण दिढसत्तिजुत्तेण ॥876॥
तह चंडो मणहत्थी उद्दामो विषयराजमग्गम्मि ।
णाणंकुसेण धरिदो रुद्धो जह मत्तहत्थिव्व ॥877॥
ण च एदि विणिस्सरिदुं मणहत्थी झाणवारिबंधणिदो ।
बद्धो तह य पयंडो विरायरज्जूहि धीरेहिं ॥878॥
अन्वयार्थ : जैसे जिसके गण्डस्थल से मद झर रहा है और जो अत्यन्त कुपित हो रहा है ऐसे वनहस्ती यदि सांकल आदि बन्धन से रहित हो गया है और नगर के राजमार्ग में दौड़ रहा है तो दृढ़ शक्तिशाली मनुष्य तीक्ष्ण अंकुश के द्वारा उसे अपने वश में कर लेता है । उसी प्रकार प्रचण्ड नरक आदि दुर्गतियों में मनुष्यों को डाल देने में तत्पर ऐसा मन रूपी हाथी उद्दण्ड है-संयम आदि सांकलों से रहित है और रूप रस आदि पंचेन्द्रियों के विषय रूपी राजमार्ग में दौड़ रहा है, उसको पूर्वापर विवेक के विषयभूत ज्ञानरूपी अंकुश के द्वारा मुनि अपने वश में कर लेते हैं ।