
सुयणो पिच्छंतो वि हु ण दुक्ख-लेसं पि सक्कदे गहिदुं
एवं जाणंतो वि हु तो वि ममत्तं ण छंडेइ ॥77॥
अन्वयार्थ : [सुयणो] स्वजन [पिच्छंतो वि हु] देखता हुआ भी [दुक्खलेसंपि] दु:ख का लेश भी [गहिदुं] ग्रहण करने को [ण सक्कदे] समर्थ नहीं होता है [एवं जाणंतो वि हु] इस तरह प्रत्यक्षरूप से जानता हुआ भी [ममत्तं ण छंडेइ] कुटुम्ब से ममत्व नहीं छोडता है ।
छाबडा
छाबडा :
अपना दु:ख आप ही भोगता है, कोई बाँट नहीं सकता है, यह जीव ऐसा अज्ञानी है कि दु:ख सहता हुआ भी पर के ममत्व को नहीं छोडता है ।
अब कहते हैं कि इस जीव के निश्चय से धर्म ही स्वजन है -
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