+ दुर्गंधित देह -
सुट्ठु पवित्तं दव्वं सरस-सुगंधं मणोहरं जं पि
देह-णिहित्तं जायदि घिणावणं सुट्ठुदुग्गंधं ॥84॥
अन्वयार्थ : [देहणिहित्तं] इस शरीर में लगाये गये [सुट्ठुपवित्तं] अत्‍यन्‍त पवित्र [सरससुगंधं] सरस और सुगन्धित [मणोहरं जं पि] मन को हरनेवाले [दव्‍वं] द्रव्‍य भी [घिणावणं] घिनावने [सुट्ठदुग्‍गंधं] तथा अत्‍यन्‍त दुर्गंधित [जायदि] हो जाते हैं ।

  छाबडा 

छाबडा :

इस शरीर के चन्‍दन, कपूर आदि (सुगन्धित पदार्थ) लगाने से दुर्गंधित हो जाते है । रस-सहित उत्तम मिष्‍ठान्‍नादि खिलाने से मलादिक-रूप परिणम जाते है । अन्‍य भी वस्‍तुएँ इस शरीर के स्‍पर्श से अस्पृश्य हो जाती हैं ।

और भी इस शरीर को अशुचि दिखाते हैं -