
मणुयाणं असुइमयं विहिणा देहं विणिम्मियं जाण
तेसिं विरमण-कज्जे ते पुण तत्थेव अणुरत्ता ॥85॥
अन्वयार्थ : [मणुयाणं] यह मनुष्यों का [देहं] देह [विहिणा] कर्म के द्वारा [तेसिं विरमण-कज्जे] उससे विरक्त करने के लिए [असुइमयं] अशुचिमय [विणिम्मियं जाण] रचा गया जान [ते पुण तत्थेव अणुरत्ता] परन्तु ये मनुष्य उसमें भी अनुरागी होते हैं ।
छाबडा
छाबडा :
और भी इसी अर्थ को दृढ़ करते हैं -
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