
एवंविहं पि देहं पिच्छंता वि य कुणंति अणुरायं
सेवंति आयरेण य अलद्ध- पुव्वं ति मण्णंता ॥86॥
अन्वयार्थ : [एवं विहं पि देहं] इस तरह पहिले कहे अनुसार अशुचि शरीर को [पिच्छंता वि य] प्रत्यक्ष देखता हुआ भी यह मनुष्य उसमें [अणुरायं] अनुराग [कुणंति] करता है [अलद्धपुव्वं त्ति मण्णंता] जैसे ऐसा शरीर कभी पहिले न पाया हो ऐसा मानता हुआ [आयरेण य सेवंति] आदरपूर्वक इसकी सेवा करता है ।
छाबडा
छाबडा :
अब कहते हैं कि इस शरीर से विरक्त होनेवाले के अशुचि-भावना सफल है -
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