अन्वयार्थ : [जो] जो (भव्य जीव)[परदेहविरत्तो] परदेह (स्त्री आदिक की देह) से विरक्त होकर [णियदेहे] अपने शरीर में [अणुरायं] अनुराग [ण य करेदि] नहीं करता है [अप्पसरूव सुरत्तो] अपने आत्म-स्वरूप में अनुरक्त रहता है [तस्स] उसके [असुइत्ते भावणा] अशुचि-भावना है ।
छाबडा
छाबडा :
(देहादि के) केवल विचार ही से जिसकी वैराग्य प्रगट होता हो तो उसके यह भावना सत्यार्थ कहलाती है ।
(दोहा)
स्वपर देहकू अशुचि लखि, तजै तास अनुराग ।
ताके सांची भावना, सो कहिये बडभाग ॥६॥