+ उपसंहार -
जो पर-देह-विरत्तो णिय-देहे ण य करेदि अणुरायं
अप्प- सरू व-सुरत्तो असुइत्ते भावणा तस्स ॥87॥
अन्वयार्थ : [जो] जो (भव्‍य जीव) [परदेहविरत्तो] परदेह (स्‍त्री आदिक की देह) से विरक्‍त होकर [णियदेहे] अपने शरीर में [अणुरायं] अनुराग [ण य करेदि] नहीं करता है [अप्‍पसरूव सुरत्तो] अपने आत्‍म-स्‍वरूप में अनुरक्‍त रहता है [तस्‍स] उसके [असुइत्‍ते भावणा] अशुचि-भावना है ।

  छाबडा 

छाबडा :

(देहादि के) केवल विचार ही से जिसकी वैराग्‍य प्रगट होता हो तो उसके यह भावना सत्‍यार्थ कहलाती है ।

(दोहा)

स्‍वपर देहकू अशुचि लखि, तजै तास अनुराग ।
ताके सांची भावना, सो कहिये बडभाग ॥६॥
इति अशुचित्‍वानुप्रेक्षा समाप्‍ता ॥६॥