+ आस्रव अनुप्रेक्षा का स्वरूप -
मण-वयण-काय-जोया जीव -पएसाण फंदण-विसेसा
मोहोदएण जुत्ता विजुदा वि य आसवा होंति ॥88॥
अन्वयार्थ : [मणवयणकायजोया] मन-वचन-काय योग हैं [आसवा होंति] वे ही आस्रव हैं [जीवपयेसाणफंदणविसेसा] जीव के प्रदेशों का स्‍पंदन (चलायमान होना, काँपना) विशेष है वह ही योग है [मोहोदएण जुत्‍ता विजुदा वि य] वह मोह के उदय (मिथ्‍यात्‍व कषाय) सहित है और मोह के उदय रहित भी है ।

  छाबडा 

छाबडा :

मन वचन काय का निमित्‍त पाकर जीव के प्रदेशों का चलाचल होना सो योग है उसी को आस्रव कहते है। वे गुणस्‍थान की परिपाटी में सूक्ष्‍मसांपराय / दसवें गुणस्‍थान तक तो मोह के उदयरूप यथा-संभव मिथ्‍यात्‍व / कषाय सहित होते हैं उसको सांपरायिक आस्रव कहते हैं और उपर तेहरवें गुणस्‍थान तक मोह उदय से रहित होते हैं उसको ईर्यापथ आस्रव कहते हैं। जो पुद्गल वर्गणा कर्मरूप परिणमती है उसको द्रव्‍य-आस्रव कहते है और जीव के प्रदेश चंचल होते हैं उसको भाव-आस्रव कहते हैं ।

अब मोह के उदय-सहित आस्रव है ऐसा विशेषरूप से कहते हैं -