एदे मोहय-भावा जो परिवज्जेइ उवसमे लीणो हेयं ति मण्णमाणो आसव-अणुवेहणं तस्स ॥94॥
अन्वयार्थ : [जो] जो [उपसमे लीणो] उपशम परिणामों (वीतराग भावों में) लीन होकर [एदे मोहयभावा] ये पहिले कहे अनुसार मोह को [हेयं ति मण्णमाणो परिवज्जेइ] हेय (त्यागने योग्य) जानता हुआ छोड़ता है [तस्स आसव अणुपेहणं] उसके आस्रवानुप्रेक्षा होती है ।
छाबडा
छाबडा :
दोहा
आस्रव पंच प्रकार कूं, चिंतवैं विकार;;ते पावैं निजस्वरूपकूं, यहैं भावना सार ॥७॥