+ परीषह जय -
सो वि परीसह-विजओ छुहादि -पीडाण अइ-रउद्दाणं
सवणाणं च मुणीणं उवसम-भावेण जं सहणं ॥98॥
अन्वयार्थ : [जं] जो [अइरउद्दाणं] अति रौद्र (भयानक) [छुहादि पीडाण] क्षुधा आदि पीडाओं को [उवसमभावेण सहणं] उपशमभावों (वीतरागभावों) से सहना (सो) [सवणाणं च मुणीणं] ज्ञानी महामुनियों के [परीसहविजओ] परीषहों का जीतना कहलाता है ।

  छाबडा