
अप्प-सरू वं वत्थुं चत्तं रायादिएहिं दोसेहिं ।
सज्झाणम्मि णिलीणं तं जाणसु उत्तमं चरणं ॥99॥
अन्वयार्थ : जो [अप्पसरूवं वत्थुं] आत्म-स्वरूप वस्तु है उसका [चत्तं रायादिएहिं दोसेहिं] रागादि दोषों से रहित [सज्झाणम्मि णिलीणं] धर्म शुक्ल ध्यान में लीन होना है [तं] उसको [उत्तम चरणं] तू उत्तम चारित्र [जाणसु] जान ।
छाबडा
छाबडा :
अब कहते हैं कि जो ऐसे संवर का आचरण नहीं करता है वह संसार में भटकता है -
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