
एदे संवर-हेदुं वियारमाणो वि जो ण आयरइ
सो भमइ चिरं कालं संसारे दुक्ख-संतत्तो ॥100॥
अन्वयार्थ : [जो] जो पुरूष [एदे] इन [संवरहेदुं] संवर के कारणों को [वियारमाणो वि] विचारता हुआ भी [ण आयरइ] आचरण नहीं करता है [सो] वह [दुक्खसंतत्तो] दु:खों से तप्तायमान होकर [चिरं कालं] बहुत समय तक [संसारे] संसार में [भमइ] भ्रमण करता है ।
छाबडा
छाबडा :
अब कहते हैं कि संवर कैसे पुरुष के होता है -
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