अन्वयार्थ : [जो] जो [विसयविरत्तो] इन्द्रियों के विषयों से विरक्त होता हुआ [मणहरविसएहिंतो] मन को प्रिय लगनेवाले विषयों से [अप्पाणं] आत्मा को [सुव्वदा] सदाकाल (हमेशा)[संवरइ] संवररूप करता है [तस्स फुडं संवरो होदि] उसके प्रगटरूप से संवर होता है ।
छाबडा
छाबडा :
इन्द्रिय तथा मन को विषयों से रोके और अपने शुद्ध स्वरूप में रमण करावे उसके संवर होता है ।
(दोहा)
गुप्ति समिति वृष भावना, जयन परीसहकार
चारित धारै संग तजि, सो मुनि संवरधार ॥८॥