
छाबडा :
जो ज्ञान-सहित तप करता है उसके तप से निर्जरा होती है । अज्ञानी विपर्यय तप करता है उसमें हिंसादिक दोष होते हैं, ऐसे तप से तो उलटे कर्म का बन्ध ही होता है । तप करके मद करता है, दूसरे को न्यून (हीन) गिनता है, कोई पूजादिक (सत्कार विशेष) नहीं करता है तो उससे क्रोध करता है ऐसे तप से बन्ध ही होता है । गर्व-रहित तप से निर्जरा होती है । जो तप करके इस लोक या पर-लोक में ख्याति, लाभ, पूजा और इन्द्रियों के विषय-भोग चाहता है उसके बन्ध ही होता है । निदान रहित तप से निर्जरा होती है । जो संसार-देह-भोग में आसक्त होकर तप करता है उसका आशय (ह्रदय) शुद्ध नहीं होता है उसके निर्जरा नहीं होती है । वैराग्य-भावना से ही निर्जरा होती है, ऐसा जानना चाहिये । अब निर्जरा का स्वरूप कहते हैं - |