+ निशल्य तप द्वारा निर्जरा -
वारस-विहेण तवसा णियाण-रहियस्स णिज्जरा होदि
वेरग्ग-भावणादो णिरहंकारस्स णाणिस्स ॥102॥
अन्वयार्थ : [णियाणरहियस्‍स] निदान (इन्द्रियविषयों की इच्‍छा) रहित [णिरहंकारस्‍स] अहंकार [अभिमान] रहित [णाणिस्‍स] ज्ञानी के [वारसविहेण तवसा] बारह प्रकार के तप से तथा [वेरग्‍गभावणादो] वैराग्‍य-भावना (संसार-देह-भोग से विरक्त परिणाम) से [णिज्‍जरा होदि] निर्जरा होती है ।

  छाबडा 

छाबडा :

जो ज्ञान-सहित तप करता है उसके तप से निर्जरा होती है । अज्ञानी विपर्यय तप करता है उसमें हिंसादिक दोष होते हैं, ऐसे तप से तो उलटे कर्म का बन्‍ध ही होता है । तप करके मद करता है, दूसरे को न्‍यून (हीन) गिनता है, कोई पूजादिक (सत्‍कार विशेष) नहीं करता है तो उससे क्रोध करता है ऐसे तप से बन्‍ध ही होता है । गर्व-रहित तप से निर्जरा होती है । जो तप करके इस लोक या पर-लोक में ख्‍याति, लाभ, पूजा और इन्द्रियों के विषय-भोग चाहता है उसके बन्‍ध ही होता है । निदान रहित तप से निर्जरा होती है । जो संसार-देह-भोग में आसक्त हो‍कर तप करता है उसका आशय (ह्रदय) शुद्ध नहीं होता है उसके निर्जरा नहीं होती है । वैराग्‍य-भावना से ही निर्जरा होती है, ऐसा जानना चाहि‍ये ।

अब निर्जरा का स्‍वरूप कहते हैं -