अज्जव-मिलेच्छ -खंडे भोग-महीसु वि कुभोग-भूमीसु
मणुया हवंति दुविहा णिव्वित्ति-अपुण्णगा पुण्णा ॥132॥
अन्वयार्थ : [मणुआ] मनुष्य [अज्जव मिलेच्छखंडे] आर्यखण्ड में, म्लेच्छखण्ड में [भोगभूमीसु वि कुभोगभूमीसु] भोगभूमि में तथा कुभोगभूमि में [हवंति] हैं, ये चारों ही [पुण्णा] पर्याप्त [णिव्वित्ति अपुण्णगा] और निवृत्ति अपर्याप्त के भेद से [दुविहा] दो-दो प्रकार के होकर, सब आठ भेद होते हैं ।

  छाबडा