
सम्मुच्छणा मणुस्सा अज्जव-खंडेसु होंति णियमेण
ते पुण लद्धि -अपुण्णा णारय-देवा वि ते दुविहा ॥133॥
अन्वयार्थ : [सम्मुच्छणा मणुस्सा] सम्मूर्च्छन मनुष्य, [अज्जवखंडेसु] आर्य-खण्ड में ही [णियमेण होंति] नियम से होते हैं, [ते पुण लद्धि -अपुण्णा] वे लब्ध्यपर्याप्तक ही हैं । [णारय देवा वि ते दुविहा] नारकी तथा देव, पर्याप्त और निर्वत्य-पर्याप्त के भेद से चार प्रकार के हैं ।
छाबडा