तस्सेव कारणाणं पुग्गल-खंधाण जा हु णिप्पत्ती
सा पज्जत्ती भण्णदि छब्भेया जिणवरिंदेहिं ॥135॥
अन्वयार्थ : [तस्सेव कारणाणं] उस शक्ति प्रवृत्ति की पूर्णता को कारण जो [पुग्गलखंधाण जा हु णिप्पत्ति] पुदूगल स्कन्धों की निष्पत्ति (पूर्णता होना), [सा] वह [जिणवरिंदेहिं] जिनेन्द्र भगवान के द्वारा[ छब्भेया पज्जत्ती भणणदि] छह भेदवाली पर्याप्ति कही गयी हे।

  छाबडा