पज्जत्तिं गिण्हंतो मणु-पज्जत्तिं ण जाव समणोदि
ता णिव्वत्ति-अपुण्णो मण -पुण्णो भण्ण दे पुण्णो ॥136॥
अन्वयार्थ : [पज्जत्तिं गिण्हंतो] यह जीव पर्याप्ति को ग्रहण करता हुआ [मणु-पज्जत्तिं ण जाव समणोदि] जब तक मन-पर्याप्ति को पूर्ण नहीं करता है, [ता णिव्वत्ति-अपुण्णो] तब तक निर्व॑त्यपर्याप्तक कहलाता है; [मण-पुण्णो भण्ण दे पुण्णो] जब मनपर्याप्ति पूर्ण हो जाती है, तब पर्याप्तक कहलाता है ।

  छाबडा