उस्सासट्ठारसमे भागे जो मरदि ण य समाणेदि
एक्को वि य पज्जत्ती लद्धि-अपुण्णो हवे सो दु ॥137॥
अन्वयार्थ :  [जो उस्सासट्ठारसमे भागे मरदि] जो जीव, श्वास के अठारहवें भाग में मरता है, [एक्को वि य पज्जत्ती ण य समाणेदि] एक भी पर्याप्ति को पूर्ण नहीं करता है, [लद्धि-अपुण्णो हवे सो दु] वह जीव लब्ध्यपर्याप्तक कहलाता है ।

  छाबडा