वि-ति-चउरक्खा जीवा हवंति णियमेण कम्म-भूमीसु
चरिमे दीवे अद्धे चरम समुद्दे वि सव्वेसु ॥142॥
अन्वयार्थ : [वितिचउरक्खा जीवा] द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय (विकलत्रय) जीव [णियमेण कम्मभूमीसु हवंति] नियम से कर्मभूमि में ही होते हैं [चरमे दीवे अद्धे] तथा अन्त के आधे द्वीप में [चरमसमुद्दे वि सम्वेसु] और अन्त के सम्पूर्ण समुद्र में होते हैं ।

  छाबडा