देवा वि णारया वि य लद्धियपुण्णा हु संतरा होंति
सम्मुच्छियां वि मणुया सेसा सव्वे णिरंतरया ॥152॥
अन्वयार्थ : [देवा वि णारया वि य लद्धियपुण्णा हु] देव, नारकी, लब्ध्यपर्याप्तक [सम्मुच्छिया वि मणुया] और सम्मूर्छन मनुष्य [संतरा होंति] ये तो सान्तर (अन्तर सहित) हैं [सेसा सव्वे णिरंतरया] अवशेष सब जीव निरन्तर हैं ।

  छाबडा