
सच्चेयण-पच्चक्खं जो जीवं णेव मण्णदे मूढो
सो जीवं ण मुणंतो जीवाभावं कहं कुणदि ॥182॥
अन्वयार्थ : [सच्चेयण पञ्चक्खं] यह जीव सत्-रूप और चैतन्य-स्वरूप स्व-संवेदन प्रत्यक्ष प्रमाण से प्रसिद्ध है [जो जीवं णेय मण्णदे] जो जीव को ऐसा नहीं मानता है [सो मूढो] वह मूर्ख है [जो जीवं ण मुणंतो] और जो जीव को नहीं मानता है तो वह [जीवाभावं कहं कुणदि] जीव का अभाव कैसे करता है ?
छाबडा