
दि ण य हवेदि जीवो ता को वेदेदि सुक्ख-दुक्खाणि
इंदिय-विसया सव्वे को वा जाणदि विसेसेण ॥183॥
अन्वयार्थ : [जदि जीओ ण य हवेदि] यदि जीव नहीं होवे तो [सुक्खदुक्खाणि] अपने सुख-दुःख को [को वेदेदि] कौन भोगता है और [ईंदियविसया सव्वे] इन्द्रियों के स्पर्श आदि सब विषयों को [विसेसेण] विशेषरूप से [को वा जाणदि] कौन जानता है ?
छाबडा