संकप्प-मओ जीवो सुह-दुक्खमयं हवेइ संकप्पो
तं चिय वेददि जीवो देहे मिलिदो वि सव्वत्थ ॥184॥
अन्वयार्थ : [जीवो संकप्पमओ] जीव संकल्पमयी है [संकप्पो सुहदुक्खमयं हवेइ] संकल्प सुखदुःखमय है [तं चिय वेददि जीवो] उस सुखदुःखमयी संकल्प को भोगता है वह जीव है [देहे मिलिदो वि सव्वत्थ] वह देह में सब जगह मिला हुआ है (तो भी जाननेवाला जीव है)

  छाबडा