+ जीव के कर्तत्व आदि -
जीवो हवेइ कत्ता सव्वंकम्माणि कुव्वदे जम्हा
कालाइ-लद्धि-जुत्तो संसारं कु णइ मोक्खं च ॥188॥
अन्वयार्थ : [जम्हा] क्योंकि [जीवो] यह जीव [सव्वं कम्माणि कुव्वदे] सब कर्म को करता हुआ [कत्ता हवेइ] कर्ता होता हुआ [संसारं कुणइ] संसार को करता है [कालाइलद्धिजत्तो] और काल आदि लब्धि से युक्त होता हुआ [मोक्खं च] अपने मोक्ष को भी आप ही करता है ।

  छाबडा