
रयणत्तय-संजुत्तारे जीवो वि हवेइ उत्तमं तित्थं
संसारं तरइ जदो रयणत्तय-दिव्व-णावाए ॥191॥
अन्वयार्थ : [जदो] जब यह जीव [रयणत्तयदिव्वणावाए] रत्नत्रयरूप सुन्दर नाव के द्वारा [संसारं तरइ] संसार से तिरता है तब [जीवो वि] यह ही जीव [रयणचयसंजुचो] रत्नत्रय सहित होता हुआ [उत्तमं तित्थं हवेइ] उत्तम तीर्थ है ।
छाबडा