+ बहिरात्मा -
मिच्छत्त-परिणदप्पा तिव्व-कसाएण सुट्ठु आविट्ठो
जीवं देहं एक्कं मण्णंतो होदि बहिरप्पा ॥193॥
अन्वयार्थ : [मिच्छत्तपरिणदप्पा] जो जीव मिथ्यात्वरूप परिणमा हो [तिव्वकसाएण सुठु आविट्ठो] और तीव्र-कषाय (अनन्तानुबन्धी) से अतिशय आविष्ठ अर्थात् युक्त हो इस निमित्त से [जीवं देहं एक्कं मण्णंतो] जीव और देह को एक मानता हो वह जीव [बहिरप्पा होदि] बहिरात्मा होता है ।

  छाबडा