+ अंतरात्मा -
जे जिण-वयणे कुसला भेयं जाणंति जीव-देहाणं
णिज्जिय-दुट्ठट्ठ-मया अंतरप्पा य ते तिविहा ॥194॥
अन्वयार्थ : [जे जिणवयणे कुसलो] जो जीव जिनवचन में प्रवीण हैं [जीवदेहाणं भेयं जाणंति] जीव और देह के भेद को जानते हैं [णिजियदुट्टमया] और जिन्होंने आठ मदों को जीत लिया है [अंतरअप्पा य ते तिविहा] वे अन्तरात्मा हैं जो कि (उत्तम, मध्यम, जघन्य के भेद से) तीन प्रकार के हैं ।

  छाबडा