पंच-महव्वय-जुत्ता धम्मे सुक्के वि संठिदा णिच्चं
णिज्जिय-सयल-पमाया उक्किट्ठा अंतरा होंति ॥195॥
अन्वयार्थ : [पंचमहव्वयजत्ता] जो जीव पांच-महाव्रतों से युक्त हों [णिच्चं धम्मे सुक्के वि संठिदा] नित्य ही धर्म-ध्यान शुक्ल-ध्यान में स्थित रहते हों [णिजियसयलपमाया] और जिन्होंने निद्रा आदि सब प्रमादों को जीत लिया हो [उक्किट्ठा अंतरा होंति] वे उत्कृष्ट अन्तरात्मा होते हैं ।

  छाबडा