सावय-गुणेहिं जुत्ता पमत्त-विरदा य मज्झिमा होंति
जिण-वयणे अणुरत्ता उवसम-सीला महासत्ता ॥196॥
अन्वयार्थ : [जिणवयणे अणुरत्ता] जो जिनवचनों में अनुरक्त हों [उवसमसीला] उपशमभाव (मन्द कषाय) रूप जिनका स्वभाव हो [महासत्ता] महा-पराक्रमी हों, परीषहादिक के सहन करने में दृढ़ हों, उपसर्ग आने पर प्रतिज्ञा से चलायमान नहीं होते हों ऐसे [सावयगुणेहिं जत्ता] श्रावक के व्रत सहित तथा [पमत्तविरदा य मज्झिमा होंति] प्रमत्तविरत गुणस्थानवर्ती मुनि मध्यम अंतरात्मा होते हैं ।

  छाबडा