
अविरय -सम्मादिट्ठी होंति जहण्णा विणिंद पय भत्ता
अप्पाणं णिंदंता गुण-गहणे सुट्ठुअणुरत्ता ॥197॥
अन्वयार्थ : [जिणंदपयभत्ता] जिनेन्द्र भगवान के चरणों के भक्त, [अप्पाणं णिदंता] अपने आत्मा की निन्दा करते रहते हैं [गुणगहणे सुठ्ठअणुरत्ता] और गुणों के ग्रहण करने में भलेप्रकार अनुरागी हैं ऐसे [अविरयसम्मद्दिट्ठी] अविरतसम्यग्दृष्टि जीव [जहण्णा होंति] जघन्य अन्तरात्मा हैं ।
छाबडा