
उत्तम-गुणाण धामं सव्व-दव्वाण उत्तमं दव्वं
तच्चाण परम-तच्चं जीवं जाणेह णिच्छयदो ॥204॥
अन्वयार्थ : [उत्तमगुणाण धामं] जीव-द्रव्य उत्तम गुणों का धाम है, ज्ञान आदि उत्तमगुण इसी में हैं [सव्वदव्याण उत्तमं दव्व] सब द्रव्यों में यह ही द्रव्य प्रधान है, सब द्रव्यों को जीव ही प्रकाशित करता है [तच्चाण परमतच्चं जीवं] सब तत्त्वों में परमतत्त्व जीव ही है, अनन्तज्ञान सुख आदि का भोक्ता यह ही है [णिच्छयदो जाणेह] इस तरह से हे भव्य ! तू निश्चयसे जान ।
छाबडा