
अंतर-तच्चं जीवो बाहिर-तच्चं हवंति सेसाणि
णाण-विहीणं दव्वं हियाहियं णेय जाणेदि ॥205॥
अन्वयार्थ : [जीवो अंतरतच्चं] जीव अतंरतत्त्व है [सेसाणि बाहिरतच्चं हवंति] बाकी के सब द्रव्य बाह्यतत्त्व हैं [णाणविहीणं दव्वं] वे द्रव्य ज्ञानरहित हैं [हियाहियं णेय जाणेदि] और हेय-उपादेयरूप वस्तु को नहीं जानते हैं ।
छाबडा