
अण्णं पि एवमाई उवयारं कुणदि जाव संसारं
मोह-अणाण-मयं पि य परिणामं कुणदि जीवस्स ॥209॥
अन्वयार्थ : [जीवस्स] जीव के [अण्णं पि एवमाई] पूर्वोक्त को आदि लेकर अन्य भी [उवयारं कुणदि] उपकार करता है [जाय संसारं] जब तक इस जीव को संसार है तब तक [मोह अणाणमयं पि य परिणामं कुणदि] मोह परिणाम अज्ञानमयी परिणाम ऐसे सुख-दुःख, जीवन-मरण आदि अनेक प्रकार करता है ।
छाबडा