+ जीव का जीव द्वारा उपकार -
जीवा वि दु जीवाणं उवयारं कुणदि सव्व-पच्चक्खं
तत्थ वि पहाण-हेऊ पुण्णं पावं च णियमेणं ॥210॥
अन्वयार्थ : [जीवा वि दु जीवाणं उवयारं कुणदि] जीव भी जीवों के परस्पर उपकार करते हैं [सव्व पञ्चक्खं] यह सब के प्रत्यक्ष ही है (स्वामी सेवक का, सेवक स्वामी का; आचार्य शिष्य का, शिष्य आचार्य का; पिता-माता पुत्र का, पुत्र पिता-माता का: मित्र मित्र का, स्त्री पति का इत्यादि प्रत्यक्ष माने जाते हैं) [तत्थ वि] उस परस्पर उपकार में भी [पुण्णं पावं च णियमेण] पुण्य-पाप कर्म नियम से [पहाणहेऊ] प्रधान कारण हैं ।

  छाबडा