
जीवा वि दु जीवाणं उवयारं कुणदि सव्व-पच्चक्खं
तत्थ वि पहाण-हेऊ पुण्णं पावं च णियमेणं ॥210॥
अन्वयार्थ : [जीवा वि दु जीवाणं उवयारं कुणदि] जीव भी जीवों के परस्पर उपकार करते हैं [सव्व पञ्चक्खं] यह सब के प्रत्यक्ष ही है [तत्थ वि] उस परस्पर उपकार में भी [पुण्णं पावं च णियमेण] पुण्य-पाप कर्म नियम से [पहाणहेऊ] प्रधान कारण हैं ।
छाबडा