
का वि अउव्वा दीसदि पुग्गल-दव्वस्स एरिसी सत्ती
केवल-णाण-सहावो विणासिदो जाइ जीवस्स ॥211॥
अन्वयार्थ : [पुग्गलदव्वस्स] पुद्गल-द्रव्य की [का वि] कोई [एरिसी] ऐसी [अपुव्वा] अपूर्व [सत्ती] शक्ति [दीसदि] दिखाई देती है [जाइ जीव] जिससे जीव का [केवलणाणसहाओ विणासिदो] केवलज्ञान स्वभाव नष्ट हो रहा है ।
छाबडा