
सयलाणं दव्वाणं जं दादुं सक्कदे हि अवगासं
तं आयासं दुविहं लोयालोयाण भेएण ॥213॥
अन्वयार्थ : जो [सयलाणं दवाणं] सब द्रव्यों को [अवगासं] अवकाश [दादु सक्कदे] देने को समर्थ है [तं आयासं] उसको आकाश द्रव्य कहते हैं [लोयालोयाण मेयेण दुविहं] वह लोक अलोक के भेद से दो प्रकार का है ।
छाबडा