जदि ण हवदि सा सत्ती सहाव-भूदा हि सव्व-दव्वाणं
एक्केक्कास-पएसे कह ता सव्वाणि वट्टंति ॥215॥
अन्वयार्थ : [जदि] यदि [सव्वदव्वाणं] सब द्रव्यों के [सहावभूदा] स्वभावभूत [सा सत्ती] वह अवगाहन शक्ति [ण हवदि] न होवे तो [एक्केकास पएसे] एक एक आकाश के प्रदेश में [कह ता सव्वाणि वट्टंति] सब द्रव्य कैसे रहते हैं ।

  छाबडा