
सव्वाणं दव्वाणं जो उवयारो हवेइ अण्णोण्णं
सो चिय कारण-भावो हवदि हु सहयारि-भावेण ॥218॥
अन्वयार्थ : [सव्वाणं दव्याणं जो] सब ही द्रव्यों के जो [अण्णोणं] परस्पर [उवयारो हवेइ] उपकार है [सो चिय] वह [सहयारिभावेण] सहकारीभाव से [कारणभावो हवदि हु] कारणभाव होता है, यह प्रगट है ।
छाबडा